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अंग्रेजों ने कैसे लूटा भारत | The Great British Loot

21:53EnglishTranscribed Jul 24, 2026
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दोस्तों मैं हूं अंग्रेज।

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मैं जा रहा हूं भारत पे कब्जा करने।

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पहले मैं वहां के राजाओं के तलवे चाटूंगा।

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फिर फूट डालो और राज करूंगा। तो चैनल को

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सब्सक्राइब कर लीजिए और वीडियो को पूरा

0:17

देखें। इतिहास के पन्नों को अगर पलट कर

0:20

देखें तो एक समय ऐसा था जब विश्व के

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मानचित्र पर भारत का स्थान किसी चमकते हुए

0:25

सूर्य के समान था। यह वह दौर था जब भारत

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को केवल कविताओं में ही नहीं बल्कि

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वास्तविकता में सोने की चिड़िया कहा जाता

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था। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस सोने

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का असली अर्थ क्या था? यह केवल राजाओं के

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खजाने में पड़ा सोना चांदी या कोहिनूर

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हीरा नहीं था। भारत की असली दौलत थी उसकी

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उपजाऊ मिट्टी, उसके कुशल कारीगर और उससे

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भी बढ़कर यहां के जंगलों में महकने वाले

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मसाले, काली मिर्च जिसे पश्चिमी दुनिया

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में काला सोना कहा जाता था। इलायची और

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दालचीनी की महक ने सात समंदर पार बैठे

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यूरोप वासियों की नींद उड़ा रखी थी। उस

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समय यूरोप की सर्दियां जानलेवा होती थी और

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मांस को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय

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मसालों की सख्त जरूरत थी। यही वह जरूरत थी

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जिसने लालच का रूप लिया और दुनिया के सबसे

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बड़े साम्राज्य की नींव रखी। 17वीं

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शताब्दी की शुरुआत हो रही थी। ब्रिटेन में

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उस समय गृह युद्ध और आर्थिक तंगी के बादल

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मंडरा रहे थे। वहां की अर्थव्यवस्था मुख्य

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रूप से खेती पर निर्भर थी, लेकिन वह

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नाकाफ़ साबित हो रही थी। ऐसे में ब्रिटेन

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के कुछ अमीर व्यापारियों और रईसों ने एक

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योजना बनाई। उनकी नजरें पूर्व की ओर थी।

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जहां भारत और इंडोनेशिया जैसे देश मसालों

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से भरे पड़े थे। तारीख थी 31 दिसंबर 1600।

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लंदन के एक अंधेरे कमरे में जॉन वाट्स और

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थॉमस स्माइथी जैसे व्यापारियों ने एक बैठक

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की। उन्होंने ब्रिटेन की तत्कालीन महारानी

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एलिजाबेथ प्रथम के सामने एक प्रस्ताव रखा।

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प्रस्ताव यह था कि उन्हें पूर्वी देशों के

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साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया जाए।

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महारानी ने शाही फरमान पर हस्ताक्षर कर

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दिए और इस तरह जन्म हुआ इतिहास की सबसे

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खतरनाक कॉरपोरेट कंपनी का द गवर्नर एंड

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कंपनी ऑफ मर्चेंट्स ऑफ लंदन ट्रेडिंग इन

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टू द ईस्ट इंडीज जिसे [संगीत] दुनिया ने

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बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के नाम से

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जाना। यह केवल एक कंपनी नहीं थी। यह एक

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ऐसा विचार था जो तराजू लेकर निकला था।

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लेकिन जिसकी नजरें तलवार पर थी। ब्रिटेन

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से भारत का सफर आसान नहीं था। तूफानी

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समुद्रों, समुद्री लुटेरों और बीमारियों

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से लड़ते हुए 1608 में एक ब्रिटिश जहाज

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हेक्टर भारत के पश्चिमी तट पर सूरत

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बंदरगाह पर लंगर डालता है। इस जहाज से

2:23

उतरने वाला व्यक्ति था कैप्टन विलियम

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हॉकिंस। लेकिन अंग्रेजों के लिए भारत का

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दरवाजा खुला नहीं था। उस समय भारत पर

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मुगलों का शासन था और समुद्र के रास्तों

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पर पहले से ही पुर्तगालियों का कब्जा था।

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पुर्तगाली व्यापारी मुगलों के दरबार में

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अपनी पैठ बना चुके थे और वे किसी भी कीमत

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पर अंग्रेजों को यहां टिकने नहीं देना

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चाहते थे। जब हॉकिंस ने आगरा जाकर मुगल

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बादशाह जहांगीर से मुलाकात की और व्यापार

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की अनुमति मांगी तो पुर्तगालियों के दबाव

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में जहांगीर ने उन्हें खाली हाथ लौटा

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दिया। यह अंग्रेजों के लिए एक बड़ा झटका

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था लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्हें

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[संगीत] पता था कि अगर भारत के खजाने तक

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पहुंचना है तो उन्हें कूटनीति का रास्ता

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अपनाना होगा। अंग्रेजों ने अपनी रणनीति

3:01

बदली। 1615 में ब्रिटेन के राजा जेम्स

3:04

प्रथम ने अपने सबसे चतुर राजदूत सर थॉमस

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रो को जहांगीर के दरबार में भेजा। थॉमस रो

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एक साधारण व्यापारी नहीं थे। वे एक मंझे

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हुए कूटनीतिज थे। वे अपने साथ ब्रिटेन से

3:15

मखमली कपड़े, शराब और नायाब पेंटिंग्स

3:18

लेकर आए थे जो मुगल बादशाह को लुभाने के

3:20

लिए काफी थी। थॉमस रो ने लगभग 3 साल तक

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मुगलों के दरबार में समय बिताया। उन्होंने

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जहांगीर को यह विश्वास दिला दिया कि

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अंग्रेज केवल व्यापारी हैं और उनका

3:29

उद्देश्य मुगलों की सुरक्षा करना और

3:31

उन्हें राजस्व देना है। आखिरकार जहांगीर

3:34

का दिल पसीज गया। उसने वह ऐतिहासिक

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दस्तावेज जारी किया जिसने भारत के भाग्य

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को हमेशा के लिए बदल दिया। जहांगीर ने

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ईस्ट इंडिया कंपनी को सूरत में अपनी पहली

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फैक्ट्री कारखाना लगाने की अनुमति दे दी।

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उस समय किसी को अंदाजा नहीं था कि कागज का

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वह एक टुकड़ा आने वाली सदियों में भारत के

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लिए गुलामी की जंजीर बन जाएगा। अनुमति

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मिलते ही अंग्रेजों ने अपनी चाले चलनी

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शुरू कर दी। 1619 तक उन्होंने सूरत, आगरा,

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अहमदाबाद और भड़ूच में अपने व्यापारिक

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केंद्र स्थापित कर लिए। उनकी नजर अब केवल

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मसालों पर नहीं थी, बल्कि वे भारत के सूती

4:07

कपड़े, रेशम, नील और शोरा जो बारूद बनाने

4:10

के काम आता था, पर भी कब्जा जमाना चाहते

4:12

थे, धीरे-धीरे उन्होंने दक्षिण भारत की ओर

4:15

रुख किया और 1639 में मद्रास अब चेन्नई

4:19

में अपनी पकड़ मजबूत की। इसके बाद 1668

4:22

में इंग्लैंड के राजा चार्ल्स द्वितीय को

4:24

पुर्तगालियों से दहेज में बॉम्बे अब मुंबई

4:27

का द्वीप मिला। जिसे उन्होंने मात्र 10

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पाउंड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी

4:32

को सौंप दिया। अब अंग्रेजों के पास पश्चिम

4:34

में बॉम्बे और दक्षिण में मद्रास जैसे

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मजबूत गढ़ थे। लेकिन उनकी सबसे ललचाई

4:39

नजरें भारत के सबसे अमीर सूबे बंगाल पर

4:42

थीं। कोलकाता अब कोलकाता उस समय व्यापार

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का केंद्र था। 1690 के आसपास जॉब चार्नॉक

4:48

ने कोलकाता में एक व्यापारिक कोठी की नींव

4:50

रखी। 1700 तक आते-आते अंग्रेजों ने यहां

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फोर्ट विलियम का निर्माण शुरू कर दिया। यह

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केवल एक गोदाम नहीं था बल्कि एक किलेबंदी

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थी। 17वीं सदी खत्म होते-होते ईस्ट इंडिया

5:01

कंपनी भारत में अपनी जड़े जमा चुकी थी।

5:03

लेकिन अब उनका मुकाबला केवल भारतीय

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व्यापारियों से नहीं था। फ्रांस की फ्रेंच

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ईस्ट इंडिया कंपनी और डच ईस्ट इंडिया

5:10

कंपनी भी भारत की संपत्ति को नोचने के लिए

5:12

कतार में थी। इन यूरोपीय शक्तियों के बीच

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भारत की धरती पर कई युद्ध हुए। लेकिन अपनी

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बेहतर नौसेना और धूर्त रणनीतियों के कारण

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अंग्रेज सब पर भारी पड़े। सन 1707 में

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मुगल बादशाह औरंगजेब की मृत्यु हो गई।

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औरंगजेब के जाने के बाद मुग़ल साम्राज्य

5:27

ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा। दिल्ली

5:30

की गद्दी कमजोर पड़ गई और अलग-अलग राज्यों

5:32

के नवाब और राजा स्वतंत्र होने लगे।

5:35

अंग्रेजों ने इसी अराजकता का इंतजार किया

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था। उन्होंने देख लिया था कि भारत के राजा

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आपस में लड़ रहे हैं। उनमें एकता की कमी

5:42

है और जाति पाति का भेदभाव समाज को खोखला

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कर रहा है। अंग्रेज समझ गए थे कि अब समय आ

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गया है तराजू को एक तरफ रखने का और तलवार

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उठाने का। वे अब केवल मुनाफा कमाने वाले

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व्यापारी नहीं रहना चाहते थे। वे अब भारत

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की जमीन और राजस्व पर अपना अधिकार चाहते

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थे। 1750 का दशक आते-आते भारत के आसमान पर

6:00

काले बादल मंडराने लगे थे जो आने वाले 200

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वर्षों के तूफान का संकेत दे रहे थे।

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18वीं शताब्दी के मध्य तक भारत का बंगाल

6:08

प्रांत दुनिया के सबसे समृद्ध क्षेत्रों

6:10

में से एक था। उस समय बंगाल में आज का

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पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार और ओसा

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शामिल थे। मुगलों की कमजोर होती पकड़ के

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बीच बंगाल के नवाब स्वतंत्र शासक की तरह

6:21

व्यवहार करने लगे थे। अंग्रेजों की ललचाई

6:23

आंखें इसी खजाने पर टिकी थी। वे बंगाल से

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रेशम और सूती कपड़े का भारी व्यापार करते

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थे। लेकिन वे टैक्स कर देने से कतराते थे।

6:31

1756 में बंगाल की गद्दी पर एक युवा और

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तेजतर्रार नवाब बैठा सिराजुद्दौला। सिराज

6:37

को अंग्रेजों की मंशा पहले दिन से ही खटक

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रही थी। उन्होंने [संगीत] देखा कि अंग्रेज

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ना केवल टैक्स चोरी कर रहे हैं बल्कि

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कोलकाता में अपनी कोठी फोर्ट विलियम की

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किलेबंदी कर रहे हैं और वहां हथियार जमा

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कर रहे हैं। नवाब ने सख्त लहजे में

6:50

अंग्रेजों को संदेश भिजवाया तुम व्यापारी

6:53

हो व्यापारी बनकर रहो। किले बनाना

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तुम्हारा काम नहीं है। अंग्रेजों ने नवाब

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के आदेश को अनसुना कर दिया। इस अपमान का

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बदला लेने के लिए सिराजुद्दौला ने अपनी

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विशाल सेना के साथ कोलकाता पर हमला बोल

7:04

दिया और अंग्रेजों को वहां से खदेड़ दिया।

7:07

यह अंग्रेजों के लिए एक शर्मनाक हार थी।

7:09

जब यह खबर मद्रास में बैठे ब्रिटिश

7:11

अधिकारी रॉबर्ट क्लाइव तक पहुंची तो वह

7:14

तिलमिला उठा। क्लाइव एक धूर्त और क्रूर

7:16

सेनापति था। वह समझ गया था कि सीधी लड़ाई

7:19

में सिराज की विशाल सेना को हराना

7:21

नामुमकिन है। इसलिए उसने वह रास्ता चुना

7:24

जिसमें अंग्रेज माहिर थे। षड्यंत्र और

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धोखा। क्लाइव अपनी सेना लेकर बंगाल

7:28

पहुंचा। लेकिन उसने तलवार चलाने से पहले

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नवाब के दरबार में गद्दारों को ढूंढना

7:33

शुरू किया। उसे शिकार मिल गया मीर जाफर।

7:35

मीर जाफर नवाब सिराज उद्दौला का सेनापति

7:38

था। लेकिन उसके दिल में नवाब बनने की हसरत

7:41

थी। रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर के साथ एक

7:43

गुप्त समझौता किया। तुम युद्ध के मैदान

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में अपनी सेना को लड़ने से रोक दो। हम

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सिराज को हरा देंगे और इनाम में तुम्हें

7:50

बंगाल का नवाब बना देंगे। सौदा पक्का हो

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गया। भारत की गुलामी के दस्तावेज पर

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हस्ताक्षर हो चुके थे। तारीख थी 23 जून

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1757। नदिया जिले के प्लासी के मैदान में

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दोनों सेनाएं आमने-सामने थी। एक तरफ

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सिराजुद्दौला की 50,000 सैनिकों की विशाल

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फौज थी, और दूसरी तरफ रॉबर्ट क्लाइव के

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पास मात्र 3000 सैनिक थे। देखने वालों को

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लग रहा था कि अंग्रेज कुछ ही घंटों में

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कुचले जाएंगे। लेकिन जैसे ही युद्ध का

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बिगुल बजा, इतिहास का सबसे बड़ा धोखा

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सामने आया। नवाब की सेना का एक बड़ा

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हिस्सा जिसकी कमान मीर जाफर के हाथ में

8:24

थी, वह मूर्ति बनकर खड़ा रहा। उन्होंने

8:27

अपनी तलवारें मयान से बाहर ही नहीं

8:28

निकाली। सिराज उद्दौला हक्का बक्का रह

8:31

गया। अपने ही सेनापति के विश्वासघात से

8:34

उसका मनोबल टूट गया। युद्ध के मैदान में

8:36

बारिश ने भी नवाब की बारूद गीली कर दी।

8:39

जबकि अंग्रेजों ने अपनी बारूद बचा ली थी।

8:41

प्लासी का युद्ध कोई युद्ध नहीं बल्कि एक

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सौदा था। शाम होते-होते सिराज उद्दौला को

8:47

भागना पड़ा और बाद में मीर जाफर के बेटे

8:49

ने उनकी हत्या कर दी। भारत के इतिहास में

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यह वह काला दिन था जब एक विदेशी कंपनी ने

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भारत के सबसे अमीर सूबे पर परोक्ष रूप से

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कब्जा कर लिया। वादे के मुताबिक क्लाइव ने

9:01

मीर जाफर को बंगाल का नवाब तो बना दिया

9:03

लेकिन वह केवल नाम का राजा था। असली डोर

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अंग्रेजों के हाथ में थी। अंग्रेज उसे

9:08

सोने की बोरी समझते थे और जब चाहे धन मांग

9:11

लेते थे। जब मीर जाफर ने आनाकानी की तो

9:14

उसे हटाकर उसके दामाद मीर कासिम को नवाब

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बना दिया गया। लेकिन मीर कासिम स्वाभिमानी

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निकला। उसने अंग्रेजों की लूट पर रोक

9:21

लगाने की कोशिश की और अपनी राजधानी मुंगेर

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ले गया। नतीजतन 1764 में बक्सर का युद्ध

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हुआ। इस बार मुकाबला कड़ा था। मीर कासिम

9:30

ने अवध के नवाब और मुगल बादशाह शाह आलम

9:33

द्वितीय के साथ मिलकर अंग्रेजों को चुनौती

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दी। लेकिन ब्रिटिश सेना का अनुशासन और

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आधुनिक हथियार उन पर भारी पड़े। बक्सर की

9:41

जीत प्लासी से भी ज्यादा महत्वपूर्ण थी।

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1765 में इलाहाबाद की संधि हुई जिसने

9:47

अंग्रेजों को बंगाल, बिहार और ओसा की

9:50

दीवानी दिला दी। इसका मतलब था कि अब इन

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राज्यों से राजस्व वसूलने का कानूनी

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अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी का हो गया। अब

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उन्हें व्यापार के लिए ब्रिटेन से सोना

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लाने की जरूरत नहीं थी। वे भारत के पैसे

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से ही भारत का सामान खरीदते और मुनाफा

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कमाते। यहीं से कंपनी का असली राज्य शुरू

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हुआ। बंगाल पर कब्जा करने के बाद

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अंग्रेजों की भूख बढ़ गई। अब उनकी नजर

10:12

मैसूर, मराठा और पंजाब जैसे शक्तिशाली

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राज्यों पर थी। मैसूर में टीपू सुल्तान

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जैसे शेर ने अंग्रेजों को लोहे के चने

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चबवाए। लेकिन अंततः 1799 में अपनों की

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गद्दारी और अंग्रेजों की घेराबंदी के कारण

10:27

वे शहीद हो गए। इसके बाद लॉर्ड वेलेजली ने

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एक नई चाल चली सहायक संधि। यह एक मीठा जहर

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था। अंग्रेज भारतीय राजाओं से कहते, हम

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आपको अपनी सेना किराए पर देंगे आपकी

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सुरक्षा के लिए। लेकिन बदले में आपको

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हमारी सेना का खर्चा उठाना होगा और अपने

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दरबार में हमारा एक रेजिडेंट रखना होगा।

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जिस राजा ने यह संधि मानी, उसने अपनी

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आजादी बेच दी। धीरे-धीरे अंग्रेज उस राज्य

10:51

की विदेश नीति और आंतरिक मामलों में दखल

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देने लगते और अगर राजा सेना का पैसा नहीं

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चुका पाता तो उसका आधा राज्य हड़प लेते।

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हैदराबाद के निजाम से लेकर मराठों तक कई

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राज्य इस जाल में फंसे जो नहीं झुके उन पर

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हड़प नीति थोप दी गई जैसा कि झांसी और

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सतारा के साथ हुआ। 1850 आते-आते भारत का

11:11

नक्शा बदल चुका था। कश्मीर से कन्याकुमारी

11:14

तक भगवा और हरे झंडों की जगह अब यूनियन

11:17

जैक लहरा रहा था। तराजू लेकर आए सौदागर अब

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भारत की तकदीर लिखने वाले विधाता बन बैठे

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थे। प्लासी और बक्सर के युद्धों ने

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अंग्रेजों को भारत का शासक तो बना दिया था

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लेकिन अब उनका अगला लक्ष्य भारत की आत्मा

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को कुचलना था। यह वह दौर था जब सोने की

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चिड़िया के पंख नोचे जा रहे थे। ब्रिटेन

11:35

में औद्योगिक क्रांति शुरू हो चुकी थी और

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वहां की मशीनों को चलाने के लिए कच्चे माल

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की भूख थी। अंग्रेजों ने तय किया कि भारत

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अब दुनिया को सामान बेचने वाला देश नहीं

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बल्कि ब्रिटेन की फैक्ट्रियों के लिए

11:47

कच्चा माल पैदा करने वाला खेत बनकर रह

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जाएगा। एक समय था जब भारतीय जुलाहों

11:52

द्वारा बुना गया कपड़ा पूरी दुनिया में

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मशहूर था। ढाका की मलमल इतनी बारीक होती

11:57

थी कि पूरा थान एक अंगूठी से निकल जाता

12:00

था। लेकिन ब्रिटेन के मैनचेस्टर और

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लंकाशायर में बनी मिलों का कपड़ा भारत के

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हाथ से बुने कपड़े का मुकाबला नहीं कर पा

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रहा था। अंग्रेजों ने एक क्रूर नीति

12:09

अपनाई। उन्होंने भारतीय कपड़ों पर ब्रिटेन

12:12

में भारी टैक्स लगा दिया। जबकि ब्रिटेन से

12:14

आने वाले मशीनी कपड़े को भारत में टैक्स

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फ्री कर दिया। नतीजा यह हुआ कि सस्ता

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विदेशी कपड़ा भारतीय बाजारों में भर गया।

12:22

लाखों बुनकर बेरोजगार हो गए। कहा जाता है

12:24

कि बंगाल के कुशल कारीगरों के अंगूठे तक

12:27

काट दिए गए ताकि वे दोबारा वैसा बारीक

12:30

कपड़ा ना बुन [संगीत] सके जो भारत कभी

12:32

कपड़ा निर्यात करता था। अब वह अपने तन को

12:34

ढकने के लिए विदेशी कपड़ों का मोहताज हो

12:37

गया। भारत की आत्मनिर्भरता की रीड तोड़ दी

12:40

गई थी। 1853 में जब पहली ट्रेन मुंबई से

12:44

ठाणे के बीच चली तो इसे भारत के विकास का

12:46

प्रतीक बताया गया। लेकिन सच्चाई कुछ और

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थी। अंग्रेजों ने रेलवे का जाल भारतीयों

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की सुविधा के लिए नहीं बल्कि अपनी लूट को

12:54

आसान बनाने के लिए बिछाया था। रेल की

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पटरियां भारत की छाती पर बिछाई गई वे नसें

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थी जिनके जरिए देश के कोने-कोने से अनाज,

13:02

कपास और खनिज खींचकर बंदरगाहों तक

13:05

पहुंचाया जाता था और वहां से सीधे ब्रिटेन

13:07

भेज दिया जाता था। इसके अलावा रेलवे का

13:10

मुख्य उद्देश्य यह था कि अगर कहीं भी

13:12

भारतीय विद्रोह करें तो ब्रिटिश सेना को

13:14

चंद घंटों में वहां पहुंचाकर विद्रोह को

13:17

कुचला जा सके। यह विकास भारतीयों के खून

13:20

पसीने की कमाई से बना था। लेकिन इसमें सफर

13:22

करने पर भी भारतीयों के साथ कुत्तों

13:25

[संगीत] जैसा बर्ताव होता था। इस दौर का

13:27

सबसे भयानक अध्याय था नील की खेती।

13:30

ब्रिटेन के कपड़ा उद्योगों को रंगने के

13:32

लिए नील की जरूरत [संगीत] थी। अंग्रेजों

13:34

ने बिहार और बंगाल के किसानों को अपनी

13:36

उपजाऊ जमीन पर चावल या गेहूं उगाने से रोक

13:39

दिया और जबरदस्ती नील उगाने का फरमान

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सुनाया। यह एक ऐसा सौदा था जिसमें किसान

13:45

की बर्बादी तय थी। नील की जड़े इतनी गहरी

13:47

होती थी कि वह जमीन की सारी ताकत खींच

13:50

लेती थी जिससे वह खेत बंजर हो जाता था।

13:53

अगर किसान नील उगाने से मना करता तो

13:55

ब्रिटिश बागान मालिक कोड़े बरसाते। उनके

13:57

घरों को आग लगा देते और उनकी महिलाओं को

14:00

बेइज्जत करते। किसान अपनी ही जमीन पर

14:02

गुलाम बन गया था। उसे वह फसल उगानी पड़ती

14:05

थी जिसे वह खा नहीं सकता था और बदले में

14:07

उसे जो दाम मिलते थे, उससे एक वक्त की

14:10

रोटी भी नहीं आती थी। नीलदर्पण नाटक में

14:12

इस दर्द को जिस तरह दिखाया गया, उसने समाज

14:15

को झझोर कर रख दिया। अंग्रेजी राज का सबसे

14:17

काला सच था अकाल। 18वीं और 19वीं सदी के

14:21

अंत में भारत ने ऐसे भयानक अकाल देखे

14:24

जिनका जिक्र आते ही रूह कांप जाती है।

14:26

1876, 1878 का भीषण अकाल और 1899 का अकाल

14:33

प्राकृतिक आपदा से ज्यादा एक सरकारी हत्या

14:35

थी। जब मद्रास, मैसूर और महाराष्ट्र में

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बारिश नहीं हुई और फसलें सूख गई तब भी

14:41

अंग्रेजों ने अनाज का निर्यात नहीं रोका।

14:44

भारत के गोदामों में पड़ा गेहूं और चावल

14:46

जहाजों में भरकर ब्रिटेन भेजा जा रहा था

14:49

ताकि वहां के लोग भूखे ना रहें और युद्ध

14:51

के लिए अनाज जमा रहे। इधर भारत में लोग

14:54

भूख से तड़प-तड़प कर मर रहे थे। सड़कों पर

14:57

लाशों के ढेर लगे थे। लोग पेड़ों की छाल

14:59

और मिट्टी खाने को मजबूर थे। माएं अपने

15:02

बच्चों को चंद सिक्कों के लिए बेचने को

15:04

तैयार थी ताकि उन्हें एक रोटी मिल सके। एक

15:07

तरफ भारत में 50 लाख से ज्यादा लोग भूख से

15:10

मर रहे थे और दूसरी तरफ 1877 में वायसराय

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लॉर्ड लिटन दिल्ली में रानी विक्टोरिया के

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सम्मान में एक भव्य दिल्ली दरबार का आयोजन

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कर रहा था। जहां शराब और पकवानों की

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नदियां बह रही थी। यह दृश्य नीरों के

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बांसुरी बजाने जैसा था जब रोम जल रहा था।

15:27

लूट और भूख के साथ-साथ अंग्रेजों ने

15:29

भारतीयों के आत्मसम्मान को भी कुचल दिया

15:32

था। अब वे भारत में मेहमान नहीं बल्कि

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मालिक थे। क्लबों और पार्कों के बाहर

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तख्तियां लटकी होती थी। कुत्तों और

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भारतीयों का प्रवेश वर्जित है। रेल के

15:41

डिब्बों में भारतीयों को अंग्रेजों के

15:43

सामने बैठने की अनुमति नहीं थी। अंग्रेजों

15:46

ने अपनी शिक्षा नीति के जरिए एक ऐसा वर्ग

15:48

तैयार करने की कोशिश की जो रंग और रूप में

15:51

भारतीय हो। लेकिन सोच और नैतिकता में

15:54

अंग्रेज हो। उनका मकसद ऐसे क्लर्क बाबू

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पैदा करना था जो उनके प्रशासन को चला सकें

15:59

ना कि ऐसे नागरिक जो सवाल पूछ सकें। इतना

16:02

अत्याचार सहने के बाद भारत की धरती अब

16:04

कांपने लगी थी। किसानों का गुस्सा, राजाओं

16:07

का खोया हुआ राज्य, सैनिकों का अपमान और

16:10

आम आदमी की भूख, यह सब बारूद के ढेर की

16:13

तरह जमा हो रहा था। लोगों को समझ आ गया था

16:15

कि यह विदेशी शासक उनके कभी नहीं हो सकते।

16:18

यह अंधकार का युग अपने चरम पर था और जैसा

16:21

कि कहा जाता है रात जितनी काली होती है

16:24

सवेरा उतना ही करीब होता है। भारत के सीने

16:26

में दबी यह आग अब ज्वालामुखी बनकर फटने

16:29

वाली थी। 1857 की क्रांति हालांकि कुचल दी

16:33

गई थी, लेकिन उसने यह साबित कर दिया कि

16:35

भारत अब चुप नहीं बैठेगा। 19वीं सदी का

16:38

अंत होते-होते कांग्रेस की स्थापना और नए

16:40

विचारकों के उदय ने आजादी की लड़ाई को एक

16:43

नई दिशा दे दी थी। सदी बदल रही थी और उसके

16:46

साथ बदल रहा था भारत का मिजाज। अब भारत वह

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लाचार देश नहीं था जो केवल सहना जानता था।

16:53

1857 की क्रांति जिसे अंग्रेजों ने सिपाही

16:56

विद्रोह कहकर खारिज कर दिया था। दरअसल वह

16:59

आजादी की पहली सामूहिक हुंकार थी। मंगल

17:02

पांडे की बंदूक से निकली उस एक गोली ने

17:04

बैरकपुर में जो चिंगारी जलाई उसने रानी

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लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और कुंवर सिंह

17:09

जैसे सुरमाओं के जरिए पूरे उत्तर भारत को

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जला दिया था। भले ही अंग्रेजों ने उस

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विद्रोह को अपनी क्रूरता से दबा दिया और

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ईस्ट इंडिया कंपनी की जगह सीधे ब्रिटिश

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क्राउन महारानी विक्टोरिया का शासन लागू

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कर दिया। लेकिन भारतीयों के दिलों से डर

17:23

हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। 20वीं सदी

17:26

की शुरुआत में अंग्रेजों ने फूट डालो और

17:28

राज करो कि नीति को और तेज कर दिया। 1905

17:32

में बंगाल का विभाजन इसी साजिश का हिस्सा

17:34

था। लेकिन अंग्रेजों की क्रूरता की सारी

17:36

हदें तब पार हो गई जब बैसाखी का दिन आया।

17:39

13 अप्रैल 1919 अमृतसर के जलियांवाला बाग

17:43

में हजारों निहत्ते लोग, बच्चे, बूढ़े और

17:46

महिलाएं शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। तभी

17:49

जनरल डायर अपनी फौज के साथ वहां पहुंचा।

17:52

उसने बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता बंद

17:54

किया और बिना किसी चेतावनी के गोली चलाने

17:57

का आदेश दे दिया। 10 मिनट तक गोलियां

17:59

बरसती रहीं। वहां की मिट्टी खून से लाल हो

18:01

गई। कुआं लाशों से भर गया। इस नरसंहार ने

18:04

भारत की अंतरात्मा को झकझोर दिया। अब भारत

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सुधार नहीं चाहता था। अब उसे पूर्ण

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स्वराज्य चाहिए था। इस घटना ने एक 12 साल

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के बच्चे भगत सिंह के मन में क्रांति के

18:14

बीज बो दिए और रविंद्र नाथ टैगोर जैसे

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शांत कवियों को भी अपनी सर की उपाधि

18:19

लौटाने पर मजबूर कर दिया। इस दौरान आजादी

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की लड़ाई दो धाराओं में बहने लगी। एक तरफ

18:24

थे महात्मा गांधी जो लाठी और सत्य के

18:27

सहारे एक ऐसा युद्ध लड़ रहे थे जिसमें

18:30

हथियार नहीं उठते थे। उनका असहयोग आंदोलन

18:32

और दांडी यात्रा नमक सत्याग्रह अंग्रेजों

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के लिए पहेली बन गए थे। अंग्रेज गोलियां

18:37

चला सकते थे। लेकिन उन निहत्ते लोगों का

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क्या करते जो हंसते-हंसते जेल जाने को

18:42

तैयार थे। गांधी जी ने आम आदमी को यह

18:44

एहसास दिलाया कि मुट्ठी भर अंग्रेज

18:47

करोड़ों भारतीयों पर तभी तक राज कर रहे

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हैं जब तक हम उन्हें करने दे रहे हैं।

18:51

दूसरी तरफ थे वे दीवाने जो अपनी जवानी देश

18:54

पर कुर्बान करने को बेताब थे। चंद्रशेखर

18:57

आजाद, भगत सिंह, राजगुरु सुखदेव और राम

19:00

प्रसाद बिस्मिल। इनका मानना था कि बहरे

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कानों को सुनाने के लिए धमाकों की जरूरत

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होती है। काकोरी में सरकारी खजाना लूटने

19:08

से लेकर असेंबली में बम फेंकने तक इन

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क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों की नींद हराम

19:13

कर दी। जब [संगीत] 23 साल के भगत सिंह ने

19:15

फांसी के फंदे को चूमा तो उनके चेहरे पर

19:18

मुस्कान थी। उनकी शहादत ने देश के हर युवा

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को बारूद बना दिया। 1939 में दूसरा विश्व

19:24

युद्ध शुरू हुआ। हिटलर की सेना ब्रिटेन पर

19:27

कहर बरपा रही थी। अंग्रेज कमजोर पड़ रहे

19:29

थे। इसी मौके का फायदा उठाने के लिए भारत

19:32

के शेर सुभाष चंद्र बोस देश से बाहर

19:35

निकले। उन्होंने नारा दिया तुम मुझे खून

19:37

दो। मैं तुम्हें आजादी दूंगा। उन्होंने

19:39

जापान और जर्मनी की मदद से आजाद हिंद फौज

19:42

को फिर से खड़ा किया। जब आईएनए के सैनिक

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कदम कदम बढ़ाए जाग आते हुए बर्मा म्यांमार

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के रास्ते भारत की ओर बढ़े तो ब्रिटिश

19:50

भारतीय सेना के अंदर भी बगावत की लहर दौड़

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गई। अंग्रेजों को सबसे बड़ा झटका 1946 में

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लगा। जब बंबई मुंबई में रॉयल इंडियन नेवी

19:59

नौसेना का विद्रोह हुआ। भारतीय सैनिकों ने

20:01

जहाजों पर से यूनियन जैक उतार फेंका और

20:04

तिरंगा फहरा दिया। अब अंग्रेजों को यकीन

20:06

हो गया था कि वे सेना के दम पर भी भारत को

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नहीं दबा सकते। ब्रिटेन खुद युद्ध में

20:11

इतना बर्बाद हो चुका था कि उसके पास अब

20:14

भारत जैसे विशाल देश को संभालने की ना तो

20:16

ताकत थी और ना ही पैसा। आखिरकार वह समय आ

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गया जिसका सदियों से इंतजार था। ब्रिटेन

20:22

के प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने घोषणा

20:24

की कि अंग्रेज भारत छोड़ देंगे। लॉर्ड

20:27

माउंटबेटन को अंतिम वायसराय बनाकर भारत

20:30

भेजा गया ताकि सत्ता का हस्तांतरण किया जा

20:32

सके। लेकिन जाते-जाते भी अंग्रेज भारत को

20:35

एक ऐसा जख्म दे गए जो कभी नहीं भरेगा

20:37

विभाजन। देश को धर्म के नाम पर दो टुकड़ों

20:40

में बांट दिया गया। भारत और पाकिस्तान।

20:43

नक्शे पर खींची गई रेड्लिफ लाइन ने दिलों

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को भी बांट दिया। आजादी का जश्न तो था

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लेकिन साथ में दंगों की चीखें भी थी।

20:50

लाखों लोग बेघर हुए। ट्रेनें लाशों से

20:52

भरकर आईं। यह आजादी की बहुत भारी कीमत थी।

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14 15 अगस्त की मध्य रात्रि को जब पूरी

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दुनिया सो रही थी, भारत अपनी जिंदगी और

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आजादी की ओर जाग रहा था। दिल्ली के लाल

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किले से यूनियन जैक उतारा गया और शान से

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तिरंगा फहराया गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू

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ने अपना ऐतिहासिक भाषण ट्रिस्ट विद

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डेस्टिनी दिया। वे अंग्रेज जो 350 साल

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पहले एक तराजू लेकर सूरत के तट पर भीख

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मांगने आए थे। आज अपने जहाज लेकर वापस लौट

21:19

रहे थे। वे अपने पीछे एक ऐसा देश छोड़ गए

21:22

थे जो आर्थिक रूप से कंगाल था। सामाजिक

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रूप से बटा हुआ था। लेकिन जो अब आजाद था।

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ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश राज का

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इतिहास हमें सिखाता है कि जब हम अपने घर

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के झगड़ों में उलझते हैं तो बाहरी

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शक्तियां उसका फायदा उठाती हैं। भारत को

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सोने की चिड़िया से एक गरीब देश बनाने

21:39

वाले अंग्रेज चले गए। लेकिन वे अपने पीछे

21:41

लोकतंत्र, रेलवे और एक ऐसा राष्ट्र छोड़

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गए जिसने अपनी राख से दोबारा उठना सीखा।

21:46

आज भारत फिर से विश्व पटल पर एक महाशक्ति

21:49

बनकर उभर रहा है।

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