0:00
नमस्कार दोस्तों, 20th जुलाई 1969 अपोलो
0:03
11 मिशन का लूनर मॉड्यूल चांद पर लैंड
0:06
करता है। इसमें बैठे हैं एस्ट्रोनॉट्स,
0:08
नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिम। लैंडिंग
0:11
के बाद नील आर्मस्ट्रांग दरवाजा खोलने की
0:13
कोशिश करते हैं चांद पर उतरने के लिए। यह
0:16
दरवाजा खोलना आसान नहीं था क्योंकि प्रेशर
0:18
बहुत ज्यादा था, लेकिन थोड़े स्ट्रगल के
0:20
बाद यह खोलने में सक्सेसफुल होते हैं। फिर
0:22
अपने भारी से स्पेस शूट में यह बाहर चांद
0:25
पर उतरने की कोशिश करते हैं। निकलने की
0:28
जगह इतनी ज्यादा नहीं थी, तो अनजाने में
0:30
ऊपर से टकरा कर लूनर मॉड्यूल का एक टुकड़ा
0:33
टूट जाता है। इन दोनों को इसके बारे में
0:36
पता नहीं चलता क्योंकि वहां पर कोई हवा
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नहीं है, तो आवाज ट्रैवल नहीं कर सकती,
0:40
कोई आवाज नहीं सुनाई देती उन्हें। लेकिन
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यह जो टुकड़ा टूटा था, यह एक बहुत ही
0:44
जरूरी पीस था। यह एक एसेंट इंजन आर्मिंग
0:47
स्विच था। इस स्विच के बिना इनका लूनर
0:50
मॉड्यूल वापस से टेक ऑफ नहीं कर सकता था
0:52
और यह वापस धरती पर नहीं जा सकते थे।
0:55
लेकिन इस बात से बेखबर नील आर्मस्ट्रांग
0:57
बाहर निकलते हैं और चांद पर कदम रखते हैं।
1:00
दुनिया के पहले इंसान बन जाते हैं चांद पर
1:13
लेकिन क्या सही में ऐसा हुआ था? आज 50 से
1:16
ज्यादा सालों बाद बहुत से लोग मानने से ही
1:19
इंकार कर देते हैं कि इंसान चांद तक गए
1:22
थे। कई लोग थ्योरीज बनाते हैं अपनी और
1:24
कहते हैं कि यह पूरी चीज अपोलो 11 का मिशन
1:27
सिर्फ एक दिखावा था अमेरिका की तरफ से।
1:30
इन्होंने धरती पर ही इस नाटक को फिल्म
1:32
किया था और दुनिया को जाकर झूठ बोला। नहीं
1:34
तो यह झंडा कैसे लहरा रहा है चांद पर बिना
1:36
हवा के? क्या है इस सब की सच्चाई? आइए
1:39
जानने की कोशिश करते हैं पूरी कहानी आज के
1:42
इस वीडियो में। थ्री टू वन
1:51
अदर थिंग बिकज़ दे आर इजी बट बिकज़ दे आर
2:08
दोस्तों, आप शायद हैरान हो जाएंगे ये
2:09
जानकर कि इस अपोलो 11 मिशन को प्लान करने
2:11
के पीछे असली वजह थी एक वॉर। स्पेसिफिकली
2:15
कहा जाए तो कोल्ड वॉर जो अमेरिका और
2:18
सोवियत यूनियन के बीच में चलने लग रही थी।
2:23
दोनों देशों के बीच में स्पेस में जाने की
2:25
एक रेस चल रही थी। साल 1957 में सोवियत
2:29
पहला देश बन जाता है दुनिया की पहली
2:31
आर्टिफिशियल सेटेलाइट ल्च करने वाला। इसका
2:33
नाम था स्पुटनिक और यह पहला मैनमेड
2:35
ऑब्जेक्ट था जिसे धरती के ऑर्बिट में
2:37
प्लेस किया गया। अमेरिकन सरकार शॉक हो
2:39
जाती है देखकर कि सोवियत उनसे आगे कैसे
2:41
निकल गए। कुछ महीने बाद 1958 में अमेरिका
2:44
भी अपनी सेटेलाइट ल्च करता है। लेकिन 3
2:46
साल बाद 1961 में अमेरिका को एक और बड़ा
2:49
झटका लगता है। सोवियत कॉस्मोनॉट यूरी
2:52
गगारिन पहले आदमी बन जाते हैं स्पेस में
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जाने वाले। एक बार फिर से सोवियट ने
2:56
अमेरिका को पीछे छोड़ दिया। इसके सिर्फ एक
2:59
हफ्ते बाद जो प्रेसिडेंट थे अमेरिका के
3:01
जॉन एफ केनेडी वह अपने वाइस प्रेसिडेंट को
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एक लेटर लिखते हैं 20 अप्रैल 1961 को। वो
3:07
पूछते हैं उनसे आखिर कैसे हम सोवियट्स को
3:09
हरा सकते हैं बाय पुटिंग अ लैबोरेटरी इन
3:11
स्पेस और बाय अ ट्रिप अराउंड द मून आर वी
3:14
वर्किंग 24 आवर्स अ डे ऑन एकिस्टिंग
3:16
प्रोग्राम्स इफ नॉट व्हाई नॉट। आर वी
3:18
मेकिंग मैक्सिमम एफर्ट? कोई और ऐसा स्पेस
3:21
प्रोग्राम है जो हम जल्दी से कर सकते हैं
3:23
जिसकी वजह से ड्रामेटिक रिजल्ट्स मिले और
3:25
हम इस रेस में आगे निकल जाएं, जीत जाएं।
3:28
इसका जवाब इन्हें कुछ ही दिनों बाद मिल
3:29
जाता है क्योंकि जल्द ही यह रियलाइज कर
3:31
लेते हैं कि अगला बड़ा कदम होगा इंसानों
3:34
को चांद पर भेजना। 25th मई 1961 को अपने
3:37
यह फेमस भाषण में वादा करते हैं दुनिया के
3:40
सामने कि यह दशक खत्म होने से पहले
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इंसानों को चांद पर भेज देंगे। और इतना ही
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नहीं जो इंसान चांद पर जाएगा उसे सेफली
3:48
वापस धरती पर लेकर भी आएंगे।
3:50
बिफोर दिस डेड आउट ऑफ लैंडिंग मैन ऑन द
3:53
मून एंड रिटर्निंग हिम सेफली टू द अर्थ
3:55
बहुत से लोगों के लिए ये एक अनबिलीवेबल
3:57
अनाउंसमेंट थी। साल 1961 इमेजिन करो
4:00
दोस्तों। कोई स्मार्टफोनस नहीं थे। कोई
4:02
इंटरनेट नहीं था। जीपीएस की टेक्नोलॉजी तक
4:05
नहीं थी। कंप्यूटरटर्स इतने पुराने हुआ
4:06
करते थे और ऐसे जमाने में यह प्रॉमिस करने
4:08
लग रहे हैं कि हम इंसानों को चांद तक
4:10
भेजेंगे। इसके लिए यह अगले 5 सालों में 7
4:13
से 9 बिलियन एडिशनल फंडिंग देते हैं स्पेस
4:16
प्रोग्राम को। पूरी स्पेस एजेंसी इस एक
4:18
मकसद को पूरा करने के लिए काम पर लग जाती
4:21
है। कुछ ही महीने बाद टेस्टिंग ऑलरेडी
4:23
शुरू हो जाती है। सबसे पहले ये टेस्ट करते
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हैं उन रॉकेट्स को जिनका ये इस्तेमाल
4:27
करेंगे धरती से बाहर निकलने के लिए। फिर
4:30
टेस्टिंग करी जाती है कमांड मॉड्यूल्स की
4:32
हीट शील्ड्स की कितना वो गर्मी से बचा
4:34
पाएंगे। सर्विस मॉड्यूल्स के प्रोपल्शन
4:36
की। 1963 से लेकर 1967 के बीच में कई सारे
4:40
टेस्ट्स किए जाते हैं जो कि सारे अनमैंड
4:42
होते हैं। यानी कि कोई इंसान नहीं बैठे
4:44
होते रॉकेटों में जब यह टेस्टिंग कर रहे
4:46
होते हैं। फरवरी 1967 में यह पहले मैंड
4:49
टेस्ट की प्लानिंग करते हैं। यानी कि ऐसा
4:51
टेस्ट जिसमें एस्ट्रोनॉट्स एक्चुअली में
4:53
स्पेसक्राफ्ट में बैठ के ऊपर तक जाएंगे।
4:56
इस मिशन को नाम दिया जाता है अपोलो वन।
4:58
लेकिन धरती पर ही हो रहे टेस्ट के दौरान
5:00
27 जनवरी 1967 को इनके केबिन में आग लग
5:04
जाती है और जो तीन एस्ट्रोनॉट्स प्रिपेयर
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कर रहे थे ऊपर तक जाने के लिए वो तीनों
5:09
मारे जाते हैं। इस दर्दनाक हादसे के बाद
5:11
नासा हार नहीं मानता बल्कि अपने आगे के
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टेस्ट जारी रखता है। अपोलो 4, अपोलो 5 और
5:17
अपोलो सिक्स ये सारे मिशनंस अनमैंड होते
5:20
हैं फिर से टेस्टिंग के लिए। अक्टूबर 1968
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में अपोलो 7 मिशन लॉन्च किया जाता है। एक
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बार फिर से अटेम्प्ट किया जाता है।
5:27
इंसानों को बिठाकर स्पेस में भेजा जाएगा
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और यह सक्सेसफुल रहता है। सिर्फ 2 महीने
5:32
बाद दिसंबर 1968 में अपोलो एट मिशन लॉन्च
5:35
किया जाता है जिसमें तीन एस्ट्रोनॉट्स को
5:37
बिठाकर चांद के पास भेजा जाता है। 3 महीने
5:40
बाद मार्च 1969 अपोलो न मिशन ल्च किया
5:43
जाता है। इसमें लूनर मॉड्यूल को टेस्ट
5:45
किया जाता है। यानी वो हिस्सा
5:46
स्पेसक्राफ्ट का जो एक्चुअली में चांद पर
5:48
उतरेगा और 2 महीने बाद मई 1969 अपोलो 10
5:52
मिशन इस मिशन में तीन एस्ट्रोनॉट्स को
5:54
ऑलमोस्ट हर चीज प्रैक्टिस के लिए कराई
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जाती है जो अपोलो 11 मिशन में कराई जाएगी
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एक्सेप्ट कि वो चांद पर लैंड करें। आप
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स्पीड देख रहे हो किस तेजी से नासा यहां
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पर एक के बाद एक मिशन लॉन्च किए जा रहा
6:06
था। हर 2 से 3 महीने के गैप में एक नया
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मिशन जिसमें नेक्स्ट चीज टेस्ट करी जाएगी।
6:10
रॉकेट्स की टेस्टिंग, स्पेसक्राफ्ट की
6:12
टेस्टिंग, चांद तक जाने की टेस्टिंग और इन
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सारी टेस्टिंग्स के बाद फाइनली जाकर 16th
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जुलाई 1969 को अपोलो 11 मिशन लॉन्च किया
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टू वन जीरो ऑल इंजन रनिंग लुक्फ वी हैव
6:34
इस मिशन का हिस्सा थे तीन एस्ट्रोनॉट्स।
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38 साल के कमांडर नील आर्मस्ट्रांग जो इस
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मिशन को लीड कर रहे थे। कमांड के मॉड्यूल
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पायलट माइकल कोलिंस और लूनर मॉड्यूल के
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पायलट एडविन बस ओल्ड्रिन। ये तीन नाम
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इतिहास के पन्नों में रचे जाते हैं। नील
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आर्मस्ट्रांग और बस ऑल्ट्रिन तो बड़े फेमस
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नाम बन जाते हैं। इनको हर कोई जानता है आज
6:53
के दिन। लेकिन माइकल कोलिंस को इतना नहीं
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जाना जाता। क्यों है ऐसा? इसके पीछे एक
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बड़ा इंटरेस्टिंग रीज़न है। आगे आपको
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बताऊंगा। तो इस अपोलो 11 मिशन का जो
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स्पेसक्राफ्ट था, इसके तीन मेन हिस्से थे
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दोस्तों। कमांड मॉड्यूल, सर्विस मॉड्यूल
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और लूनार मॉड्यूल। पहले दो को एक साथ रख
7:08
के सीएसएम बोला जाता है। कमांड एंड सर्विस
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मॉड्यूल। मकसद यह था यहां पर कि जो लूनार
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मॉड्यूल होगा सिर्फ वही हिस्सा डिटच होकर
7:16
चांद पर लैंड करेगा। और फिर वापस जाने के
7:19
लिए लूनार मॉड्यूल को उड़ाकर वापस अटैच
7:21
किया जाएगा सीएसएम से जिससे एस्ट्रोनॉट्स
7:23
धरती पर वापस आएंगे। इस पूरे स्पेसक्राफ्ट
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को लॉन्च करने के लिए एक सैटन वी5 रॉकेट
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का इस्तेमाल किया गया। लॉन्च से पहले इस
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रॉकेट में 1 मिलियन गैलंस केरोसिन लिक्विड
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ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन लोड किया
7:35
गया। तो इस पूरे रॉकेट का वजन 30 लाख किलो
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था। इसकी मदद से यह स्पेसक्राफ्ट गया अर्थ
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के ऑर्बिट में पहुंचा। ऑर्बिट तक पहुंचने
7:44
में 10 मिनट से भी कम का समय लगा। और फिर
7:46
अर्थ के ऑर्बिट का करीब डेढ़ चक्कर लगाया
7:48
इन्होंने। फिर इन्हें परमिशन मिल गई मिशन
7:50
कंट्रोल से। मिशन कंट्रोल धरती पर मौजूद
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था। उन्होंने कम्युनिकेट करके परमिशन दे
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दी कि ट्रांस लून्यर इंजेक्शन कर लिया
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जाए। मतलब धरती के ऑर्बिट से निकलकर मून
8:00
के ऑर्बिट की तरफ स्पेसक्राफ्ट को ले जा
8:02
दिया जाए। अर्थ के ऑर्बिट से बाहर निकलने
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के लिए भी सैटर्न V5 रॉकेट का ही इस्तेमाल
8:06
किया गया था। इसकी तीसरी स्टेज थी रॉकेट
8:08
की। यह सब लॉन्च के 5 घंटे के अंदर-अंदर
8:10
ही हो गया। इसके बाद एक्चुअली में चांद तक
8:13
पहुंचने में कई दिनों का समय लगा।
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एस्ट्रोनॉट्स ने इंतजार किया अंदर बैठकर
8:17
कभी खाना खाया, कभी सोए, कभी फोटो खींची
8:20
अपनी। 19 जुलाई 1969 ऑलमोस्ट 4 लाख कि.मी.
8:24
ट्रैवल करने के बाद अपोलो 11 का
8:26
स्पेसक्राफ्ट चांद के ऑर्बिट में पहुंचता
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है। यहां पर इसका काम होता है दो में
8:31
स्प्लिट हो जाना। कमांड एंड सर्विस
8:33
मॉड्यूल लूनार मॉड्यूल से अलग हो जाता है।
8:36
कमांड मॉड्यूल में बैठे थे माइकल कोलिंस
8:38
और स्पेसक्राफ्ट के इस हिस्से को निक नेम
8:40
दिया गया कोलंबिया। और दूसरी तरफ लूनार
8:42
मॉड्यूल का नाम था ईगल और इसमें बैठे थे
8:45
नील आर्मस्ट्रांग और बस ओल्ड्रिन। बात यह
8:47
थी कि यह जो कमांड एंड सर्विस मॉड्यूल था,
8:49
इसका काम था यह चांद के ऑर्बिट में ही बने
8:52
रहे। सिर्फ लूनार मॉड्यूल अलग होकर चांद
8:55
पर लैंड करेगा। यानी कि चांद पर कदम रखने
8:58
का मौका सिर्फ नील आर्मस्ट्रांग और बस
9:00
ओल्ड्रिन को मिलेगा और माइकल कोलिंस को
9:02
नहीं मिलेगा। यही रीज़न है शायद कि माइकल
9:04
कोलिंस का नाम हर कोई इतना जानता नहीं है।
9:06
हालांकि वो इस अपोलो 11 मिशन का पार्ट
9:08
जरूर थे लेकिन उन्होंने चांद पर कदम नहीं
9:11
रखा था। लेकिन फिर भी देखा जाए तो माइकल
9:12
कोलिंस का जो हिस्सा था इस मिशन में वह
9:14
शायद सबसे ज्यादा जरूरी था क्योंकि बाद
9:16
में आकर उस लूनार मॉड्यूल को वापस सीएसएम
9:19
के साथ अटैच होना था और अगर माइकल कोलिंस
9:21
नहीं होते तो नील आर्मस्ट्रांग और बस
9:23
वाल्ट्रिन जिंदा नहीं वापस लौट पाते। अब
9:25
8:00 बजे के करीब लूनार मॉड्यूल चांद पर
9:27
नीचे उतरने जा रहा था। ठीक 8:10 पर एक
9:30
अलार्म बजने लग जाता है। 122 अलार्म।
9:37
अब ना तो नील आर्मस्ट्रांग ना ही बस
9:39
ऑल्ड्रिन जानते थे कि इस अलार्म का मतलब
9:41
क्या है। वो मिशन कंट्रोल से कम्युनिकेट
9:43
करके पूछते हैं कि क्या करना चाहिए। वो
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कहते हैं इग्नोर करो आगे चलते रहो।
9:50
बाद में पता चलता है यह 122 एक्चुअली में
9:53
वार्निंग थी कि जो अपोलो का गाइडेंस
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कंप्यूटर था कंप्यूटर का प्रोसेसिंग
9:57
सिस्टम ओवरलोड हो रहा था। लेकिन थैंकफुली
9:59
डिजाइन ऐसा किया गया था कंप्यूटर का कि जो
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एसेंशियल प्रोग्राम्स हैं जो मिशन के लिए
10:04
क्रिटिकल है वो चलते रहे। ओवरलोड होने के
10:06
बाद भी कंप्यूटर में ऑटोमेटिक लैंडिंग का
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प्रोग्राम डला हुआ था जो एक्चुअली में
10:10
चांद के सरफेस पर लूनार मॉड्यूल को
10:11
ऑटोमेटिकली उतार देता। लेकिन करीब 150
10:14
मीटर की हाइट पर नील आर्मस्ट्रांग कंट्रोल
10:16
खुद से ले लेते हैं। वो नोटिस करते हैं कि
10:19
ये लूनार मॉड्यूल ऐसी जगह पर लैंड करने जा
10:22
रहा था जहां बड़े-बड़े पत्थर मौजूद थे।
10:24
लैंडिंग की जगह बदलती है और एक्चुअल
10:25
लैंडिंग साइड से करीब 4 मील दूर एक और जगह
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डिसाइड करी जाती है जहां लैंड होगा। 8:16
10:31
पर बस ऑल्ट्रेन फ्यूल का इंडिकेटर देखते
10:34
हैं। सिर्फ 5% फ्यूल बचा है।
10:42
इतने कम फ्यूल को देखकर मिशन कंट्रोल एक
10:44
काउंटडाउन इनिशिएट कर देता है। यह
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काउंटडाउन डिसाइड करेगा कि यह लैंड करें
10:48
या फिर इस मिशन को अवॉर्ड कर दिया जाए।
10:54
60 सेकंड कॉल गिवन 30 सेकंड कॉल फाइनली
10:59
लिटरली लास्ट मिनट पर सिर्फ 30 सेकंड बचे
11:02
थे इस काउंटडाउन में। नील आर्मस्ट्रांग
11:04
धरती पर एक रेडियो मैसेज भेजते हैं।
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यानी कि ईगल सक्सेसफुली लैंड कर चुका है।
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फिर नील आर्मस्ट्रांग अपना स्पेस सूट
11:19
तैयार करते हैं। दरवाजा खोलते हैं और चांद
11:22
पर अपना पहला कदम रखते हैं।
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इस मोमेंट को 60 मिलियन लोग लाइव देखने लग
11:30
रहे थे टेलीविजन पर। उनके पहले शब्द
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दुनिया को सुनाई देते हैं।
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इनके पीछे बस ओल्ड्रिन भी चांद की जमीन पर
11:44
अपना कदम रखते हैं और करीब अगले ढाई घंटे
11:46
तक ये चांद की मिट्टी और पत्थरों के
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सैंपल्स कलेक्ट करते हैं फोटोज खींचते
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हैं। कई साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स भी
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सेटअप करते हैं। हालांकि यह बात सच है कि
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कोल्ड वॉर एक बड़ा रीजन था जिसकी वजह से
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यह मून लैंडिंग करी गई। लेकिन क्योंकि मून
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लैंडिंग करी जा रही थी। इतनी बड़ी चीज थी
12:02
यह तो ऑब्वियसली साइंटिफिक इंस्ट्रूमेंट्स
12:04
भी यह साथ में लेकर गए थे और कई साइंटिफिक
12:06
ऑब्जेक्टिव्स भी थे इस मिशन के। जैसे कि
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ये एक टेलीविजन कैमरा सेटअप करते हैं मून
12:10
पर जो सिग्नल्स ट्रांसमिट कर सके धरती पर।
12:12
यह एक डिवाइस लेकर आते हैं अपने साथ जिससे
12:14
कि सोलर विंड को मेजर किया जा सके जो चांद
12:17
पर आ रही है। एक ऐसा डिवाइस इंस्टॉल करते
12:19
हैं जिससे कि लेजर बीम्स धरती पर भेजी जा
12:21
सके और उन लेजर बीम्स का इस्तेमाल करके
12:24
एग्जैक्ट डिस्टेंस बताया जा सके धरती और
12:26
चांद के बीच। साथ ही साथ एक पैसिव
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साइज्मोमीटर भी होता है जो चांद पर हो रहे
12:30
अर्थक्वेक्स को मेजर कर सके। हालांकि
12:32
उन्हें अर्थक्वेक्स नहीं उन्हें मून
12:33
क्वेक्स कहेंगे। टोटल में 23 किलो पत्थर
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और मिट्टी का सैंपल यह चांद से कलेक्ट
12:38
करते हैं और पीछे वहां छोड़ जाते हैं एक
12:41
अमेरिकन झंडा और एक प्लेट जिस पर लिखा है
12:44
हियर मेन फ्रॉम द प्लेनेट अर्थ फर्स्ट सेट
12:47
फुट अपॉन द मून। जुलाई 1969 एडी वी केम इन
12:51
पीस फॉर ऑल मैनकाइंड। लूनर मॉड्यूल को
12:53
करीब 21 घंटे तक चांद पर रहना था। उसके
12:56
बाद इसे वापस ऊपर जाकर सीएसएम मॉड्यूल से
12:58
अटैच हो जाना था। लेकिन ऊपर जाने के लिए
13:01
प्रोपल्शन की जरूरत है जिसके लिए इंजन
13:04
चाहिए। और दोनों नील आर्मस्ट्रांग और बस
13:06
ओल्ड्रिन इस बात से अनजान थे कि बाहर
13:08
निकलते वक्त उस इंजन को चलाने के लिए जो
13:10
स्विच होता है वो स्विच ही टूट गया था। इस
13:14
चीज की बात मैंने वीडियो के शुरू में करी
13:16
थी। जब वो वापस लौटते हैं अपने लूनार
13:17
मॉड्यूल में तब वो रियलाइज करते हैं कि
13:20
यहां पर क्या हो गया है। वो मिशन कंट्रोल
13:21
को इस डैमेज के बारे में बताते हैं और
13:23
सिचुएशन को रिसॉल्व करने के लिए कोई सलूशन
13:26
ढूंढते हैं। इस पूरी प्रॉब्लम का एक बड़ा
13:28
ही इंटरेस्टिंग सॉल्यूशन निकलता है। स्विच
13:30
क्या होता है? स्विच बेसिकली एक
13:32
इलेक्ट्रिकल सर्किट को वापस जोड़ने का काम
13:34
करता है। बस ऑल्ट्रिन ने रियलाइज किया कि
13:36
अगर वो सर्किट टूट गया है तो कोई ऐसी चीज
13:39
हो जिसका मैं इस्तेमाल कर सकूं उस सर्किट
13:41
को वापस जोड़ने के लिए। वह आसपास देखते
13:43
हैं और उन्हें अपना बॉल पॉइंट पेन दिखाई
13:45
देता है। वह उस बॉल पॉइंट पेन का इस्तेमाल
13:47
करते हैं उस सर्किट को वापस जोड़ने के लिए
13:49
और इंजन को वापस चालू करने के लिए। फाइनली
13:52
लूनार मॉड्यूल रीअटैच हो जाता है सीएसएम
13:55
मॉड्यूल के साथ और स्पेसक्राफ्ट को धरती
13:57
की ओर मोड़ते हैं इसमें बैठे तीनों
13:59
एस्ट्रोनॉट्स। धरती पर लैंड करने के लिए
14:02
प्लान था कि कमांड मॉड्यूल और सर्विस
14:04
मॉड्यूल अब एक दूसरे से अलग होंगे। सर्विस
14:06
मॉड्यूल एक्चुअली में अर्थ के एटमॉस्फेयर
14:08
की वजह से डिस्ट्रॉय हो जाएगा। लेकिन यहां
14:09
पर खतरा यह था कि अगर सर्विस मॉड्यूल
14:11
ज्यादा खराब हो गया उसके डिब्री इधर-उधर
14:13
उड़ने लग गए वो कमांड मॉड्यूल के साथ जाकर
14:16
टकरा सकते हैं और एस्ट्रोनॉट्स जो बैठे
14:17
होंगे उसमें वो मारे जाएंगे। इस चीज को
14:19
अवॉइड करने के लिए नासा का प्लान था कि
14:21
सर्विस मॉड्यूल में थ्रस्टिंग होगी जो उसे
14:23
थोड़ी दूर ले जाएगी कमांड मॉड्यूल से ताकि
14:26
वो टकराए ना एक दूसरे से। लेकिन जब ये
14:28
एस्ट्रोनॉट्स वापस लौट रहे थे धरती पर तब
14:30
पता चलता है कि सर्विस मॉड्यूल की
14:32
थ्रस्टिंग तो काम ही नहीं कर रही। ये
14:34
तीनों एस्ट्रोनॉट्स कमांड मॉड्यूल में
14:36
बैठे हैं। देखते हैं अपने पास सर्विस
14:38
मॉड्यूल कैसे टूटने लग रहा है। उसके डेबरी
14:40
इधर-उधर उड़ने लग रहे हैं। और यह एक बहुत
14:42
बड़ा मिरेकल होता है कि उसके टूटे हुए
14:45
पीसेस कमांड मॉड्यूल को हिट नहीं करते।
14:47
उसका कमांड मॉड्यूल सेफ रहता है।
14:49
एस्ट्रोनॉट्स के मरने का रिस्क इतना
14:51
ज्यादा हाई था इस मिशन में कि यूएस
14:53
प्रेसिडेंट निक्न ने अपनी एक अल्टरनेट
14:55
स्पीच तैयार कर रखी थी इन केस ये
14:57
एस्ट्रोनॉट्स मारे जाते। इमेजिन कर सकते
15:00
हो लिटरली एक अल्टरनेट भाषण। इन्होंने
15:02
लिखा था इसमें फेट हैज़ ऑर्डेंड दैट द मैन
15:04
हु वेंट टू द मून टू एक्सप्लोर इन पीस विल
15:06
स्टे ऑन द मून टू रेस्ट इन पीस। दी ब्रेव
15:09
मैन नील आर्मस्ट्रांग एंड एडविन ऑल्ड्रिन
15:12
नो दैट देयर इज नो होप फॉर देयर रिकवरी।
15:14
दीज़ टू मैन आर लंग डाउन देयर लाइफ्स इन
15:16
मैनकाइंड्स मोस्ट नोबल गोल द सर्च फॉर
15:19
ट्रुथ एंड अंडरस्टैंडिंग। लेकिन थैंकफुली
15:21
ऐसा होता नहीं। कमांड मॉड्यूल सेफली अर्थ
15:24
की एटमॉस्फेयर से नीचे आ जाता है। पैराशूट
15:26
डिप्लॉय करता है और समुद्र में लैंड कर
15:29
जाता है। तीनों के तीनों एस्ट्रोनॉट्स
15:31
जिंदा हैं, सेफ हैं। समुद्र में इन
15:33
एस्ट्रोनॉट्स को रेस्क्यू शिप्स के द्वारा
15:35
इवाकुएट कर लिया जाता है। यह सही मायनों
15:37
में एक चमत्कार था कि ये जिंदा वापस लौट
15:39
कर आ सके। क्योंकि ऐसा नहीं है कि इस मिशन
15:41
में हर चीज जैसा प्लान करी गई थी वैसे ही
15:44
हुई। ऑलमोस्ट हर स्टेप पर प्रॉब्लम्स
15:46
इन्हें फेस करनी पड़ी। इन्होंने उन
15:48
प्रॉब्लम से सक्सेसफुली डील किया और यह
15:50
जिंदा वापस बचकर आ सके। एक इंटरेस्टिंग
15:52
चीज यहां पर यह है कि वापस लौटने के बाद
15:54
इन तीनों एस्ट्रोनॉट्स को क्वारेंटाइन
15:56
किया गया दो हफ्ते तक। यह किसी भी और
15:58
इंसान के कांटेक्ट में नहीं आएंगे क्योंकि
16:00
खतरा यह था कि कोई पैथोज्स हो सकते हैं।
16:02
कोई ऐसे वायरसेस या बैक्टीरिया जो
16:04
इन्होंने चांद पर पाए होंगे वापस धरती पर
16:06
आकर कोई बड़ी अजीबोगरीब बीमारी हो जाए
16:09
इन्हें। कोई नहीं जानता था। लेकिन एक बारी
16:11
फिर से थैंकफुली ऐसा कुछ हुआ नहीं। अपोलो
16:13
11 की मून लैंडिंग दुनिया भर के अखबारों
16:15
में खबर बनती है जो यूएस के प्रेसिडेंट
16:17
केनेडी ने कहा था हम दशक खत्म होने से
16:20
पहले तक इंसानों को चांद पर लैंड करा
16:22
देंगे वो नासा ने कर दिखाया
16:27
इन 1969 द पब्लिक हैड लिटल रीज़ टू
16:30
क्वेश्चन मैनकाइंड हिस्टोरिक फर्स्ट ऑन द
16:33
मून आफ्टर ऑल द अचीवमेंट वास अ सेलिब्रेशन
16:36
ऑफ़ टेक्नोलॉजिकल सुपसी
16:39
अमेरिका हैड फाइनली वन द स्पेस रेस
16:43
लेकिन कितने चांस की बात नहीं है कि 1970
16:46
में ये डेकेड खत्म हो जाता और एक साल पहले
16:50
1969 में अमेरिका मून तक पहुंच गया। कहीं
16:53
ऐसा तो नहीं कि कोल्ड वॉर में अपना
16:55
एडवांटेज दिखाने के लिए अमेरिका ने ये एक
16:58
फेक मून लैंडिंग का ऑपरेशन प्लान किया।
17:01
कहीं उनका एक्चुअली मून लैंडिंग का मिशन
17:03
फेल हो गया हो और उन्होंने बैकअप के तौर
17:05
पर यह फेक मिशन प्लान किया था दुनिया को
17:07
दिखाने के लिए। यह एक एग्जांपल है दोस्तों
17:10
बहुत सारी कांस्परेसी थ्योरीज का जो बनाई
17:12
जाती हैं इस मून लैंडिंग के इंसिडेंट को
17:14
लेकर। लेकिन सच्चाई यही है दोस्तों ये
17:16
सारी कंस्परेसी थ्योरीज ऑलरेडी कई बार
17:18
डिबंक करी जा चुकी हैं। अगर अमेरिका की
17:21
तरफ से ये एक फर्जी अटेम्प्ट होता दुनिया
17:23
को बेवकूफ बनाने का तो सोवियत इसे कभी
17:26
मानता नहीं। लेकिन द ग्रेट सोवियत
17:28
इनसाइक्लोपीडिया जो 1970 और 1979 के बीच
17:31
में पब्लिश हुई थी। उसके थर्ड एडिशन में
17:33
कई बारी इस मून लैंडिंग को एक फ़क्चुअल चीज
17:36
बताया गया। सोवियट के आर्टिकल्स में कई
17:38
बार यह लिखा गया है कि अपोलो लैंडिंग थर्ड
17:41
हिस्टोरिक इवेंट था स्पेस एज का। सबसे
17:43
पहले स्पुतनिक की लॉन्च 1957 में। दूसरा
17:46
1961 में यूरी गगारन की फ्लाइट और तीसरा
17:50
मून लैंडिंग। तो सोवियत ने एक्चुअली में
17:52
इस चीज को एकनॉलेज किया था। लेकिन फिर
17:54
झंडे का क्या? जो झंडा चांद पर प्लांट
17:57
किया गया था वो वेव क्यों करने लग रहा है?
17:59
चांद पर तो कोई हवा नहीं होती। इसका एक
18:01
बड़ा सिंपल सा रीज़न है दोस्तों। जिस झंडे
18:03
को नील आर्मस्ट्रंग और बस ऑल्ट्रिन चांद
18:05
पर लेकर गए थे वो स्पेशली डिज़ झंडा था।
18:08
आमतौर पर झंडों में एक लंबी वर्टिकल रोड
18:11
डली होती है। लेकिन इस वाले में एक
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हॉरिजॉन्टल रोड भी डली हुई थी। झंडे के
18:15
बिल्कुल ऊपर जिससे कि झंडा हमेशा
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एक्सटेंडेड आउट रहे। क्योंकि नासा में काम
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करने वाला हर कोई जानता था कि झंडे को अगर
18:21
हम चांद पर जाकर प्लांट करेंगे तो वो
18:23
लहराएगा नहीं। वहां पर हवा नहीं है। इसलिए
18:25
एक हॉरिजॉन्टल रोड ऊपर ऐड कर देते हैं
18:27
ताकि झंडा हमेशा ही फ्लैट दिखे। अब अपोलो
18:30
11 के मिशन में एक्चुअली में इस
18:31
हॉरिजॉन्टल रोड को एक्सटेंड करने में
18:33
थोड़ी प्रॉब्लम हो रही थी। तो पूरी एंड तक
18:36
एक्सटेंड नहीं हो पाई है। जिसकी वजह से एक
18:38
रिल दिखने लगा। वेव्स आ गई फ्लैग में और
18:41
इसीलिए लोगों को लगता है कि ये झंडा लहरा
18:43
रहा है। लेकिन एक्चुअली में ये झंडा लहरा
18:45
नहीं रहा है। सिर्फ उन वीडियोस में आपको
18:47
झंडा लहराता हुआ दिखेगा जहां पर
18:48
एस्ट्रोनॉट्स इसे पकड़ कर हिलाने लग रहे
18:50
हैं। इसके पीछे रीज़न यह है कि यह
18:52
एलुमिनियम की रोड्स थी झंडे में और वो
18:54
स्प्रिंग की तरह एक्ट कर रही थी। तो बहुत
18:56
थोड़ी देर के लिए झंडा हिलता और फिर
18:57
एब्सोलुटली स्टिल रह जाता। एक तीसरी बड़ी
19:00
पॉपुलर थ्योरी यहां पर उठाई जाती है कि जो
19:02
फोटो यहां पर नील आर्मस्ट्रांग और ओल्डरिन
19:04
ने ली है। इन फोटोज में कोई स्टार्स क्यों
19:06
नहीं दिखाई दे रहे? इसका जवाब भी बड़ा
19:08
सिंपल है। एक्चुअली में मून लैंडिंग दिन
19:11
के समय में हुई थी। ऐसे टाइम में जब चांद
19:13
पर सूरज की रोशनी पड़ने लग रही थी। और जो
19:16
वाइट कलर के स्पेस सूट्स पहने हुए थे
19:17
एस्ट्रोनॉट्स ने वो भी काफी ज्यादा
19:19
रिफ्लेक्ट करने लग रहे थे। तो उस जमाने के
19:21
कैमरास कोई इतने बड़े हाई प्रोफेशनल तो
19:23
नहीं होते थे। वैसे आज के दिन भी जितने
19:25
फोन के कैमरास हैं उनसे अगर आप कोई रात के
19:28
समय में फोटो खींचने की कोशिश करोगे
19:30
जिसमें फ्लैश जल रहा हो तो पीछे स्टार्स
19:32
नहीं दिखेंगे आपको फोटोज में। एक और
19:34
थ्योरी यहां पर उठाई जाती है शैडोस को
19:36
लेकर कि ये शैडोस इतनी इधर-उधर क्यों हो
19:38
रखी हैं। लोग यहां पर आर्गुमेंट उठाते हैं
19:40
क्योंकि ये हॉलीवुड की तरह फिल्म बनाई जा
19:42
रही थी तो कोई सिंगल सोर्स ऑफ लाइट नहीं
19:43
था। इसलिए ये शैडोस इतनी इधर-उधर होकर दिख
19:45
रही हैं। लेकिन रियलिटी में एक्चुअली में
19:47
सन ओनली सोर्स ऑफ लाइट नहीं था। जो चांद
19:50
का सरफेस था वो भी एक तरीके से
19:52
कॉम्प्लीमेंट्री सोर्स ऑफ लाइट एक्ट कर
19:54
रहा था क्योंकि वो इतनी ज्यादा रोशनी
19:55
रिफ्लेक्ट करने लग रहा था। इसकी वजह से
19:57
लाइट हर डायरेक्शन में स्कैटर करी और
19:59
शैडोज़ इतनी अजीबोगरीब बनी। एक और सवाल
20:02
यहां पर उठाया जाता है। एक बस ऑल्ट्रेन की
20:04
फोटो जो नील आर्स्ट्रोंग ने ली है उसमें
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नील आर्स्ट्रोंग की रिफ्लेक्शन दिखने लग
20:07
रही है। लेकिन नील आर्स्ट्रोंग के हाथ में
20:09
कोई कैमरा नहीं है। यह कैसे हो सकता है?
20:12
यह इसलिए हो सकता है क्योंकि कैमरा
20:13
उन्होंने हाथ में नहीं पकड़ा था बल्कि
20:15
कैमरा उनके सूट में ही माउंटेड था और वो
20:17
वहीं से ही कंट्रोल कर सकते थे। और फिर वो
20:20
वाली फोटोस किसने ली जब नील आर्मस्ट्रांग
20:22
लूनार मॉड्यूल से नीचे उतर रहे थे। तो
20:24
इसका जवाब भी सिंपल है। वहां लूनार
20:26
मॉड्यूल में मल्टीपल कैमरास मौजूद थे।
20:28
लेकिन इन सब फर्जी थ्योरीज से हटकर अगर हम
20:31
एक्चुअल क्रिटिसिज्म की बात करें। ऐसा
20:33
नहीं था दोस्तों कि मून लैंडिंग के बाद हर
20:35
कोई तालियां बजाने लग रहा था। वाह नासा
20:37
कितना अच्छा कर दिया। बहुत से लोगों ने
20:39
काफी स्ट्रांग क्रिटिसिज्म किया नासा का
20:41
और अमेरिकन सरकार का मून लैंडिंग के बाद।
20:44
एक्चुअली मून लैंडिंग होने से पहले भी कई
20:46
लोग क्रिटिसाइज करने लग रहे थे इस चीज को।
20:48
जनवरी 1962 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक
20:50
आर्टिकल पब्लिश किया था जिसमें उन्होंने
20:53
बताया कि जितना पैसा चांद पर जाने के लिए
20:55
स्पेंड किया जा रहा है। इतने पैसे से करीब
20:58
120 यूनिवर्सिटीज बन सकती हैं जो हार्वर्ड
21:00
के साइज की होंगी। मतलब क्या हमें इतना
21:02
पैसा चांद पर जाने के लिए स्पेंड करना
21:04
चाहिए? या फिर हर यूएस की स्टेट में एक
21:07
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी खोल दें। उस पर हम
21:08
पैसा स्पेंड करें। बेसिकली मेन पॉइंट ऑफ
21:10
क्रिटिसिज्म यह था कि देश में इतनी सारी
21:13
प्रॉब्लम्स हैं। एजुकेशन की, इनकम इनकलिटी
21:16
की और उस समय अमेरिका और वियतनाम वॉर के
21:18
कॉन्सक्वेंसेस भी झेलने लग रहा था। तो
21:20
क्यों इस पर इतना पैसा बर्बाद किया? लेकिन
21:22
असलियत में मून लैंडिंग के कई ऐसे छुपे
21:24
हुए फायदे निकले जिसके बारे में किसी ने
21:26
सोचा तक नहीं था। जैसे कि कंप्यूटर चिप्स
21:29
में एडवांसमेंट्स। 1962 में माइक्रोचिप्स
21:31
को निकले हुए सिर्फ 3 साल हुए थे। और
21:33
आईबीएम ने डिसाइड किया था कि अर्ली 1960
21:36
में वो अपने कंप्यूटरटर्स में इन चिप्स को
21:37
नहीं इस्तेमाल करेंगे।
21:38
हियर इज अ पैकेज इंटीग्रेटेड सर्किट इनाइड
21:40
दिस पैकेज इज अ चिप ऑफ़ सिलिकॉन व्हिच
21:42
प्रोवाइड्स द इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट ऑफ़
21:44
मेनी ट्रांजिस्टर्स रेजिस्टर्स एंड
21:46
डायोड्स ऑल इंटरकनेक्टेड टू प्रोवाइड द
21:49
लेकिन नासा की तरफ से इतनी डिमांड आने लगी
21:51
इंटीग्रेटेड सर्किट्स बनाने के लिए। तो
21:53
आईवीएम ने इस पर काम करना शुरू किया और
21:56
क्योंकि इतनी डिमांड थी इसका प्राइस 90%
21:59
से नीचे गिर गया अगले 5 सालों में। ऐसे ही
22:01
नासा ने बेसिकली टेस्ट किया कि हम क्या
22:03
कंप्यूटरटर्स पर रिलाई कर सकते हैं
22:05
इंसानों की जिंदगियों के लिए। अगर
22:06
एस्ट्रोनॉट्स चांद पर होकर आ सकते हैं इन
22:09
कंप्यूटर चिप्स पर रिलाई करते हुए तो हम
22:11
रोजमर्रा की जिंदगी में तो ऑब्वियसली
22:13
रिलाई कर ही सकते हैं इन कंप्यूटर चिप्स
22:15
पे। टेक्नोलॉजी की ग्रोथ बड़ी तेजी से हुई
22:18
इस मून लैंडिंग के बाद। लेकिन फिर भी
22:20
अपोलो 11 मिशन के सिर्फ 3 साल बाद दिसंबर
22:23
1972 में आखिरी मून मिशन किया जाता है
22:27
अपोलो 17। और तब से लेकर अब तक दोस्तों
22:30
ऑलमोस्ट 50 साल हो चुके हैं। इन 50 सालों
22:33
में कोई भी और इंसान चांद पर नहीं गया है।
22:36
यह शायद से एक सबसे बड़ा प्रूफ है इस चीज
22:38
का कि अपोलो प्रोग्राम कितना महंगा था। 4
22:41
लाख से ज्यादा इंजीनियर्स, टेक्नशियंस और
22:42
साइंटिस्ट ने इस पर काम किया था और टोटल
22:44
कॉस्ट तब पड़ी थी इसकी 24 बिलियन। आज के
22:47
दिन के डॉलर्स में यह $ बिलियन से ज्यादा
22:50
की कॉस्ट है। शुरुआत में सिर्फ जर्नलिस्ट
22:52
इसे क्रिटिसाइज कर रहे थे। लेकिन 1972 तक
22:54
आते-आते आम जनता की भी जो फैसिनेशन थी
22:57
नासा को लेकर, मून को लेकर वह खत्म हो गई
23:00
थी। जैसे-जैसे वियतनाम वॉर आगे चलती रही,
23:02
देश में आम लोगों की प्रॉब्लम्स बढ़ती
23:05
थाउजेंड्स ऑफ़ डेमोंस्ट्रेटर्स अपोज द
23:07
वियतनाम वॉर असेंबल इन द नेशन कैपिटल फॉर
23:11
उनको यह स्पेस प्रोग्राम एक बहुत बड़ा
23:14
पैसे की वेस्टेज लगा। हालांकि नासा ने
23:16
प्लांस बनाए थे अपोलो 20 तक मिशनंस करने
23:18
के। लेकिन पॉलिटिशियंस को जनता की सुननी
23:21
पड़ी और स्पेस प्रोग्राम पर जितना पैसा
23:23
खर्च किया जा रहा था उसे कट डाउन करना
23:25
पड़ा। दिसंबर 2017 में फॉर्मर प्रेसिडेंट
23:28
डोनल्ड ट्रंप ने कहा था कि वो फंडिंग
23:30
बढ़ाएंगे जिससे कि चांद पर लोगों को वापस
23:34
रिटर्निंग अमेरिकन एस्ट्रोनॉट्स टू द मून
23:37
फॉर द फर्स्ट टाइम सिंस 1972 फॉर लॉन्ग
23:40
टर्म एक्सप्लोरेशन दिस टाइम। लेकिन बाद
23:43
में उन्होंने अपनी स्टेटमेंट बदल ली और
23:45
कहा कि नासा को चांद पर नहीं बल्कि मार्स
23:47
पर फोकस करना चाहिए। लेकिन 50 साल बाद
23:49
जाकर आज के दिन नासा ने अब फिर से प्लान
23:52
बनाया है लोगों को चांद पर भेजने का। इनका
23:55
नया आर्टिमिस प्रोग्राम। फिर से अनमैंड
23:58
रॉकेट्स के साथ टेस्टिंग करी जाएगी। लेकिन
23:59
नासा का प्लान है कि 2025-26 तक वो पहली
24:02
औरत को चांद पर भेजेंगे और उसके बाद वह
24:05
कहते हैं कि फर्स्ट पर्सन ऑफ कलर को भी
24:07
चांद पर भेजा जाएगा। एक बात तो शायद पक्का
24:09
कही जा सकती है कि इस दशक के खत्म होने से
24:12
पहले हम दोबारा से इंसानों को चांद पर
24:15
देखेंगे। वीडियो पसंद आया और स्पेस
24:17
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